Latest News

Our Blog

 

Net-House

Green Net house stablished at KVK Manawar



 

पालक

पत्तीवाली सब्जियों पालक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। पालक पोशक गुणों से भरपूर सब्जी है। इसमें कैल्षियम, प्रोटीन और विटामीन, प्रचुर मात्रा में पाये जाते है इसके साथ ही आॅक्जेलिक एसिड भी पाया जाता है।

जलवायु-
पालक की सफलतापूर्वक खेती के लिए ठण्डी जलवायु की आवष्यकता होती है। ठण्ड में पालक की पत्तियों का बढ़वार अधिक होता है जबकि तापमान अधिक होने पर इसकी बढ़वार रूक जाती है, इसलिए पालक की खेती मुख्यतः षीतकाल में करना अधिक लाभकर होता है।

भूमि-
पालक के लिए समतल भूमि का चुनाव करना चाहिए जिस जगह का चुनाव करें वहां पानी के निकास कि अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। जीवांष युक्त बलुई या दोमट या मटियार किस्म कि होती है तो उसमें पौधे कि बढ़वार अच्छी होती है। पालक के पौधे अम्लीय जमीन में नहीं बढ़ते जबकि क्षारीय जमीन में इसकी खेती आसानी पूर्व कि जा सकती है भूमि का पी.एच. 6 से 7 के मध्य हो।

प्रमुख किस्में-
वर्जिनिया सेवोय-
इसकी पत्तियां मोटी, चैडी और गहरे रंग की होती है। बीज कांटेदार होते है।

अर्ली स्मूथ लीफ-
 इस किसम की पत्तियां चिकनी, नोकदार और पतली होती है। पत्तियां पीलापन लिए हरे रंग की होती है। यह किस्म बुवाई के लगभग 30 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

आलग्रीन-
यह किस्म बुवाई के लगभग 40 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। पत्तियां समान रूप से हरी होती है। इस किस्म को वर्श पर्यन्त उगा सकते है।

जोबनेर ग्रीन-
इस किस्म की पत्तियां मोटी, मुलायम, बडे आकार की एक समान हरी होती है। यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है।

पूसा ज्योति-
इस किस्म की पत्तियां मोटी मुलायम और मांसल होती है। इस किस्म को 6-8 बार तक काट सकते है।

बुवाई का समय-
पालक की बुवाई वर्शभर की जाती है। लेकिन अधिक उपज लेने के लिए फरवरी-मार्च, सितम्बर-नवम्बर एवं जून-जुलाई में बुवाई करनी चाहिए।

बीज की मात्रा-
एक हेक्टयर के लिए 25-30 किलो बीज पर्याप्त होता है।

बुवाई कि विधि-
पालक की बुवाई क्यारियों में छिटकावां विधि से की जाती है किन्तु इसकी अधिक पैदावार लेने के लिए इसकी बुवाई पंक्तियों में करनी चाहिए। पंक्तियों और पौधों की आपसी दूरी क्रमषः 20 सेमी और 15 सेमी रखे। बीज को 2-3 सेमी गहराई पर बायों एवं बुवाई के बाद बीज को उपर सेे मिट्टी से ढंक दे।
 
खाद एवं उर्वरक-
पालक की भरपूर पैदावार लेने के लिए संतुलित मात्रा में उर्वरक देना अत्यन्त आवष्यक है। एक है. में 250-300 क्ंिव. गोबर की खाद, 100 किलो नत्रजन, 60-80 किग्रा स्फुर तथा 60 किग्रा. पोटाष देना चाहिए। गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाष की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय दे। नत्रजन को 4-5 भागों में बांटकर प्रत्येक कटाई के बाद दे।

निराई-गुराई-
यदि क्यारी में कुछ खरपतवार उग आये हो तो उन्हें जड़ से उखाड़ देना चाहिए यदि पौधे कम उगे हो तो उस अवस्था में खुरपी-कुदाल के जरिये गुराई करने से पौधे कि बढ़वार अच्छी होती है।

सिंचाई-
पत्तीदार सब्जी होने के कारण अधिक सिंचाई की आवष्यकता होती है। इसकी उचित बढ़वार के लिए भूमि में पर्याप्त नमी होना चाहिए। ग्रीश्म ऋतु में 4-5 दिन के अंतर से तथा षीत ऋतु में 10-15 दिन के अंतर सिंचाई करना चाहिए।

कीट एवं रोग प्रबंधन-
माहो- यह कीट पत्तियों का रस चुसता है। इसकी रोकथाम के लिए डायमिथेएट 2.0 मिली मात्रा का एक लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

आद्रगलन-
इस रोग में पौधे का निचला भाग गल जाता है। इस रोग की रोकथाम के लिए बीज को कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलाग्राम बीज की दर से उपचारित करे।

कटाई एवं उपज-
बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद पालक के पौधे की पत्तियों की लंबाई 15-20 सेमी लंबी हो जाए पहली कटाई के लिए तैयार हो जाते है। पत्तियां जब पूरी तरह से विकसित हो जाये लेकिन कोमल और रसीली अवस्था में हो तो जमीन की सतह से 5-6 सेमी उपर से ही पौधों को चाकू या हसिया से काट लेते है इसके बाद अगली कटाई हर 15-20 दिन बाद करते है इस प्रकार से पालक की एक फसल से लगभग 5-6 बार कटाई किया जा सकता है। कटाई के बाद क्यारी का हल्की सिंचाई कर देते है इससे पौधों कि बढ़वार तेज होती है। औसत उपज 150 से 200 क्विं. हेक्टर तक प्राप्त हो जाती है।

                                                                            मैथी


    मैथी का वानस्पतिक नाम ट्राइगोनेला फोइनमग्रेसियम एवं कस्ततुरी मैथी का वानस्पतिक नाम ट्राइगोनेला कार्निकुलाटा है। मैथी की खेती मुख्यतः सब्जियों, दानों (मसालों) एवं कुछ स्थानों पर चारों के लिए किया जाता है। मैथी के सूखे दानों का उपयोग मसाले के रूप में, सब्जियों के छौकने व बघारने, अचारों में एवं दवाइयों के निमार्ण में किया जाता है इसकी भाजी अत्यंत गुणकारी है जिसकी तुलना काड लीवर आयल से की जाती है। इसके बीज में डायोस्जेनिंग नामक स्टेरायड के कारण फार्मास्यूटिकल उद्योग मं इसकी मांग रहती है। इसका उपयोग विभिनन आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने में किया जाता है। इसकी पत्तियों में प्रोटीन, खनिज तथा विटामिन्स ‘ए‘ व सी की अधिक मात्रा पायी जाती है। इसके अतिरिक्त कैलोरीज, क्लोरीन, लोहा तथा कैल्सियम आदि पोशक तत्व की मात्रा प्राप्त होती है।

जलवायु-
मैथी षरदकालीन फसल है तथा इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है। यह पाले का सहन करने की क्षमता रखती ह। इसलिए इस फसल को ठण्डी जलवायु की अति आवष्यकता होती है। ठन्डे मौसम में अधिक वृद्धि करती है। इस फसल के लिए कम तापमान उचित होता है तथा लम्बे दिनों में अधिक वृद्धि करती है।

भूमि-
मैथी की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। किन्तु अच्छी उपज के लिए जीवांष युुक्त बलुई दोमट या दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। भूमि में जल निकास का उचित प्रबंध होना अति आवष्यक है तथा पी.ए. मान 6ण्0 से 6.7 के बीच की भूमि उपयुक्त रहती है। 

भूमि की तैयारी-
प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल सेकरने के बाद 2-3 बार बखर चलाकर खेत को समतल कर लें ताकि नमी संरक्षित रह सके। खेत साफ स्वच्छ एवं भुरभुरा तैयार हाना चाहिए।

उन्नत किस्में-
पूसा कसूरी, पूसा अर्ली, बंचिग प्लूम-55, प्लूम-57 सी.एस.-381, को-1, राजेन्द्र क्रांति, आर.एम.टी-1, आरएमटी-143 हिसार सोनाली, सीएस-960, लाम सलेक्षन-1 सी.ओ-1 एच.एम.-103 आदि।

 बीज दर एवं बीजोपचार-
इसकी 20-25 किग्रा मात्रा प्रति हैक्टर लगता है। बीज को बाने के पूर्व फफूंदनाषी दवा कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम प्रति किग्रा से उपचारित किया जावे। बीज का उपचार रायजोबियम मेलोलेटी कल्चर 5 ग्राम प्रति किग्रा के हिसाब से करने से भी लाभ मिलता है।

बुवाई का समय-
उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर से नवम्बर है। 
बुवाई की विधि- छिटकवां विधि-
 इसमें बीज क्यारियों में छिटक कर मिट्टी की पतली तह से ढक देते ह।

 पंक्तियों में बुवाई-
इस विधि में बीज की बुवाई पंक्तियों में की जाती है। पंक्तियों की आसी दूरी 30 सेमी और पौधों की आपसी दूरी 10 सेमी रखनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक-
200-250 क्विंटल गोबर की खाद, 40 किलों नत्रजन, 30 किलो स्फुर एवं 15 किलों पोटाष प्रति हैक्टर दे। गोबर की खाद बुवाई के एक माह पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला दे। स्फुर, पोटाष एवं नत्रजन की आधी मात्रा को बुवाई से पूर्व खेत में डाल दे। नत्रजन की षेश आधी मात्रा को 3-5 भागों में बांटकर प्रत्येक कटाई के बाद डाले।

 सिंचाई-
मैथी में 5-6 सिंचाई की आवष्यकता होती है। 10-15 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहे।

निराई-गुराई-
बोनी के 15 एवं 40 दिन बाद हाथ से निंदाई कर खेत खरपतावार रहित रखे। रासायनिक विधि में पेण्डीमेथिलिन 1 किग्रा सक्रिय तत्व बुचाई के पहले खेत में डाल देना चाहिए। अधिक पैदावार के लिए खेत को खरपतवारों से मुक्त रखे।

रोग एवं कीट नियंत्रण-
जल गलन रोग के बचाव के लिए जैविक फफूंदनाषी ट्राइकोडर्मा से बीज उपचार एवं मृदा उपचार करना चाहिए। फसल-चक्र अपनाना चाहिए। भभूतिया या चूर्णिल आसिता रोग के लिए कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिषत एवं घुलनषील गंधक की 0.2 प्रतिषत  मात्रा का छिड़काव करना चाहिए। महो कीट का प्रकोप दिखई देने पर 0.2 प्रतिषत डाइमेथेएट या इमिडाक्लोप्रिड 0.1 प्रतिषत घोल का छिड़काव करे एवं खेत में दीमक का प्रकोप दिखाई देने पर क्लोरपायरीफास 4 लीटर प्रति हे. की दर से सिंचाई के पानी के साथ खेत में उपयोग करे। 

 कटाई एवं पैदावार-
 मेथी की फसल की कटाई बोने से 25-30 दिन के बाद करनी षुरू हो जाती है फसल की 3-4 कटाई लेकर बाद में कटाई नहीं करनी चाहिए क्योकि पौधों को बढ़ने देते है। जिससे आग्र चलकर बीज बनाया जाता है। कटाई एक डेढ़ सप्ताह के बाद करनी चाहिए। इसकी उपज भी किस्मों एवं उपयोग में लाये जाने वाले भाग पर निर्भर करता है। यदि उन्नत किस्मों एवं सही समय पर उचित षस्य क्रियाओं को अपनाया जाये तो 70-80 क्वि. हरी पत्तियां सब्जी के लिए एवं 15-20 क्विं. दाने मसालों एवं अन्य उपयोगों के लिये प्रति हे. तक प्राप्त हो जाते है।